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शनिवार, 7 अगस्त 2010

हाजी मस्तान ने कहा था-' मैंने कभी तस्करी नहीं की'

'Once Upon a time Mumbaai' पिछले हफ्ते देखी तो हाजी मस्तान से मुलाकात याद ताजा हो गया. हाजी मस्तान से मैं ठीक १९ साल पहले मुंबई में मिला था, तब दिल्ली से पढ़ाई खत्म करके मुंबई पहुंचे मुश्किल से दो महीने हुए थे. मस्तान तब अंडरवर्ल्ड से ' रिटायर' हो चुका था. ये इंटरव्यू इंदौर से निकलने वाले साप्ताहिक ' प्रभात किरण' में जुलाई १९९१ में छपा था. इंटरव्यू के अंश-
हाजी मस्तान मिर्ज़ा, अध्यक्ष,ऑल इंडिया दलित मुस्लिम अल्पसंख्यक महासंघ, ४१०, आर्केडिया बिल्डिंग, सर जे जे रोड, जे जे अस्पताल के सामने, बम्बई- ४००००८. हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में छपा हाजी मस्तान का विजिटिंग कार्ड उनका कुल यही परिचय देता हैं. वार्डेन रोड पर सोफिया कॉलेज लेन में उनकी दुमंजिला कोठी हैं ' वर्ते-उल-सुरूर' यानी शांति निवास. पिछले शुक्रवार की शाम साढ़े पांच बजे का वक़्त दिया गया था, पहुंचने पर पता चला कि ' बाबा साहेब' (उन्हें इसी नाम से जाना जाता हैं) दोपहर को जुम्मे की नमाज के बाद सोकर नहीं उठे हैं. स्वागत कक्ष में मस्तान की तीन अलग -अलग तस्वीरें लगी थी. पहली तस्वीर जवानी की थी, कोट- टाई पहने. दूसरी तस्वीर में अधेड मस्तान का पोट्रेट था और तीसरी में दुनिया देख चुके ' बाबा साहेब' का.
करीब साढ़े छह बजे बुलावा आया. हाजी मस्तान पहली मंजिल पर अपने छोटे से कमरे में हल्के आसमानी रंग का सफारी सूट पहनकर बैठा था. सामने टेलिविजन पर ' सनम बेवफा' फिल्म चल रही थी. बताया गया कि केबल टीवी हैं. खैर बाबा साहेब ने रिमोट कंट्रोल से टीवी कि आवाज बंद कर दी और इधर बातचीत शुरू हो गई

आपने दलित मुसिलम अल्पसंख्यक सुरक्षा महासंघ क्यों बनाया?

मुसलमान और दलितों को एकजुट करने के लिए, देश में इनकी आबादी करीब चालीस फीसदी हैं, मगर ये बहुत पिछड़े हैं. पढ़ाई- लिखाई नहीं हुई, सरकारी नौकरी नहीं मिली. पुलिस और फिरकापरस्त इन पर अलग जुल्म करते हैं. एक होकर ही ये लोग हक पा सकेंगे. मौलाना आजाद और किदवई साहब के बाद कोई नेता नहीं हुआ. डा. आम्बेडकर के बाद दलितों के लिए किसी ने नहीं सोचा.

वी पी सिंह और कांशीराम भी तो आपकी पार्टी जैसा काम कर रहे हैं?
दोनों जनता को बेवकूफ बना रहे हैं. इनका मकसद वोट बैंक हैं, दलित और मुसलमानों की भलाई नहीं. आपको याद दिला दूं मैंने १९८५ में महासंघ बनाया था. बाद में इन दोनों ने सोचा

मगर १९८८ के इलाहाबाद उप चुनाव में तो आपने वी पी सिंह के लिए काम किया था?
मुझे उम्मीद थी कि यह आदमी अच्छा काम करेगा,पर इसने किसी की उम्मीद नहीं पूरी की.

आपने १९८४ में दक्षिण बम्बई से लोकसभा के लिए पर्चा दाखिल किया था, फिर वापस क्यों ले लिया?
मुझे लगा कि मैं चुनाव जीत नहीं सकूंगा, बल्कि मेरी उम्मीदवारी से फिरकापरस्तों की जीत होगी. इसी वजह से मेरी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही हैं. पहले हम जमीन पुख्ता कर रहे हैं

तो क्या आप भविष्य में चुनाव लड़ेंगे?
सोचेंगे ( सिगरेट जलाते हुए उन्होंने रुककर जवाब दिया)

आप पर तस्करी करने के आरोप लगे हैं?
मैंने कभी तस्करी नहीं की. मुझे झूठे मामलों में फंसाया गया.आपतकाल में पकड़कर घर की तलाशी ली गई मगर कुछ हाथ नहीं लगा. अदालत ने मुझे हर इल्जाम सेबाइज्जत बरी कर दिया हैं

पर जय प्रकाश नारायण के सामने तो आपने आइन्दा तस्करी तस्करी नहीं करने की कसम खायी थी. यह वादा भी किया था कि तस्करी करने वालों को रोकेंगे.
जय प्रकाशजी के सामने मैंने मुल्क के खिलाफ कोई काम नहीं करने की कसम खायी थी.रही बात तस्करों को रोकने की तो मुझे नहीं मालूम कि तस्कर कौन हैं?

फिर आपका पेशा क्या हैं?
शुरू से बिजनेस करता हूं, कपड़े की दुकानें हैं

पेशे के लिए वक्त निकाल लेते हैं?
अब नहीं, मैं समाज सेवा को ज्यादा वक्त देता हूं.दुकानें मेरे आदमी देखते हैं

इंटरव्यू में आगे हाजी ने दो बातें और कही थी. अयोध्या में मंदिर- मस्जिद दोनों बने. दोनों पक्ष न माने तो अदालत का फैसला माने. दूसरी बात ये कि भारत -पाकिस्तान को एक हो जाना चाहिए. याद रहे ये इंटरव्यू अयोध्या में विवादस्पद ढांचा गिराने से करीब डेढ़ साल पहले हुआ था. इंदौर के बारे में कुछ बातें कही थी जो शायद आज प्रासंगिक नहीं रही.
फिल्म देखने के बाद ये इंटरव्यू आज दोबारा पढ़ा तो लगा कि हाजी मस्तान इज्जत पाने की राह पर काफी आगे बढ़ चुका था. फिल्म में उसकी मौत तभी हो गई जब वो नेता बनने के लिए पहली बार मंच पर आता हैं, लेकिन असल जिंदगी में वो जेपी के सामने कसम खा चुका था, वीपी सिंह का चुनाव प्रचार कर चुका था, खुद चुनाव का पर्चा भरकर वापस ले चुका था और सबसे बड़ी बात की किसी अदालत में उस पर कोई गुनाह साबित नहीं हो पाया.


सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

शालिनीताई का स्कूल

इन्दौर के बाल निकेतन संघ की कर्ताधर्ता शालिनीताई मोघे का कल यानी ३० जून को निधन हो गया. मैंने पिछले साल स्कूल के छात्र सम्मलेन के मौके पर ये ब्लॉग लिखा था. थोड़ा ठीकठाक करके फिर प्रकाशित किया हैं                                                        बाल निकेतन संघ में नौवी से ग्यारहवीं कक्षा तक मैंने पढाई की थी.पिछले साल हमारे स्कूल के पुराने छात्रों का सम्मेलन था, तब वहाँ जाना हुआ. बड़ी अच्छी-अच्छी बाते हुई, इस स्कूल ने हम सबको बहुत कुछ सिखाया. सीखने से मेरा मतलब फिजिक्स, केमिस्ट्री या गणित नहीं हैं. ये शायद उस ज़माने में इंदौर का अकेला स्कूल था जो बाबा आम्टे, यदुनाथ थत्ते जैसे बड़े लोगो को लेक्चर देने बुलाता था. इन लोगों से जो सुनने मिला वो मन पर संस्कार छोड़ गया. सादा जीवन जीना चाहिए, पर्यावरण की रक्षा करना चाहिए. इसमें से ग्लोबल वार्मिंग तो अब फैशन में भी हैं, बहुत सारे दोस्त मुझ से नाराज होंगे पर सच तो ये हैं कि बाल निकेतन संघ अब फैशनेबल नहीं रहा.फैशनेबल से मेरा आशय हैं कि जहां आज की पीढ़ी पढ़ना चाहती हैं.
२४ साल यानी मेरी स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद इंदौर काफी बदल गया हैं. बाल विनय मंदिर सरकारी स्कूल था पर एडमिशन मुश्किल से मिलता था. बाल निकेतन प्रायवेट स्कूल था, एडमिशन के लिए अच्छे नंबर के अलावा टेस्ट देना पड़ता था. इसके अलावा दयानंद और वैष्णव जैसे स्कूल थे जहाँ इन्दौर के मिडल या लोअर मिडिल क्लास परिवारों के बच्चे पढते थे. इन स्कूलों में पढाई हिन्दी और इंग्लिश दोनों मीडियम में होते थी. बड़े परिवारों के बच्चों का स्कूल था सेंट पॉल.डेली कॉलेज तो खैर बड़े-बड़े लोगो की पहुंच से बाहर था. इंदौर बदलने का संकेत इस बात से मिलना हैं कि मेरे जानने वालों में से अब कोई बच्चा बाल विनय, बाल निकेतन, दयानंद या वैष्णव में नहीं पढता हैं. ज्यादातर बच्चे अब उन स्कूलों में पढते हैं जिनका नाम २५ साल पहले किसी ने नहीं सुना था. बाल निकेतन की तरह ये नए स्कूल इंदौर की नयी पीढ़ी बनाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ धंधा करने के लिए खुले हैं. ये स्कूल धंधा भी कर रहे हीं और आज के ज़माने की जरूरत के हिसाब से डॉक्टर, इंजिनियर पैदा करने का काम बहुत अच्छे से कर रहे हैं.
 शालिनीताई ताई मोघे ९८ साल की उम्र तक स्कूल चलती रही है, इंदौर को उनकी याद पिछले साल जाकर आई तो नागरिक अभिनंदन हुआ. शालिनीताई गाँधीवादी विचारधारा को मानने वाली महिला हैं. उन्होंने इस स्कूल को को बड़ा किया. शिक्षा के क्षेत्र में काम के लिए उन्हें १९६८ मैंने यानी मेरे पैदा होने से पहले पदमश्री मिला था. पद्म पुरस्कार के बारे में कम से कम तब कोई रेकेटबाजी का आरोप नहीं लगाता था. शालिनीताई के पिता तात्या साहेब सरवटे ने बाल निकेतन की स्थापना की थी.शालिनीताई और उनके पति दादासाहेब ने उसे बहुत आगे बढ़ाया. दादासाहेब तो हमे भी अंगरेजी पढाया करते थे. शालिनीताई से उस दिन भीड़भाड़ में लंबी बात नहीं हो पायी, पर अखबार में उनका इंटरव्यू पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा कि वो पब्लिक स्कूलों के कल्चर में बाल निकेतन को नहीं ढालना चाहतीं हैं. ये बहुत अच्छा ख्याल हैं, लेकिन मुझे दुख इस बात का हैं कि बाल निकेतन के मैदान छोड़ने या फैशनेबल ना होने का फायदा सिर्फ और सिर्फ धंधेबाज स्कूलों का हुआ हैं, नुकसान बाल निकेतन का भी नहीं हुआ हैं. इंदौर शहर जरूर घाटे में रहेगा. ये घाटा भी उनको समझ में आएगा जिन्होंने शहर को बदलते हुए देखा हैं.
शालिनी ताई को मेरी श्रद्धांजलि.

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

गूगल की जय हो !

प्रमोद महाजन जब आईटी मंत्री बने थे तो उन्होंने मुम्बई में प्रेस कांफ्रेंस के बाद पूछा था कि सरकार आप लोगों के लिए क्या कर सकते हैं? ये वैसा ही सवाल था जैसा हर नेता हरेक आदमी से पूछता हैं और आदमी चौड़ा हो जाता हैं कि मुझे पूछा तो सही. मैंने महाजन के सवाल के जवाब में कहा था कि हिंदी का फॉण्ट और टाइपिंग का यूनीफोर्म सॉफ्टवेयर डेवेलप करा दीजिए. ये कोई १० साल पहले की बात होगी. उन दिनों में सी-डेक इस दिशा में काम कर रहा था, फिर भी जितने फॉण्ट होते थे उतने की-बोर्ड.हमारे इंदौर के वेबदुनिया वालों ने भी फोनेटिक की-बोर्ड बनाया था.ये सब प्रयोग होते-होते हिंदी का एक की-बोर्ड डेवलप हो गया जो अलग-अलग फॉण्ट पर भी चलने लगा.मैं तमाम कोशिश के बाद भी इस की-बोर्ड से हिंदी टायपिंग नहीं कर पाया.हिन्दी और अंगरेजी के अलग-अलग की-बोर्ड याद करना मुश्किल हैं.

खैर, गूगल ने करीब दो-ढाई साल पहले वो सॉफ्टवेयर ला दिया जिसके जरिये आप रोमन की-बोर्ड में टाइप करें और नागरी के शब्द लिखे. ये सॉफ्टवेर भी थोडा जटिल था, लिखा हुआ सेव करने में दिक्कत होती थी और उससे भी बड़ी परेशानी ये थी कि ये सॉफ्टवेयर बिना इंटरनेट के नहीं चलता था, पर गूगल ने इस साल की शुरुआत में कमाल कर दिया. ये सॉफ्टवेर आप अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड कर सकते हैं और मजे से टाइप कर सकते हैं.ये ब्लॉग मैंने आज ऑफ़लाइन लिखा हैं.गूगल ने वो कर दिया जो भारत सरकर हिंदी के लिए नहीं कर पायी. न प्रमोद महाजन न ही उनके बाद आने वाले आईटी मंत्री.

हालाँकि स्मार्टफोन के ज़माने में ये तकनीक अभी भी पीछे हैं,ब्लैकबेरी पर आप हिंदी में मेल क्या कुछ भी लिख पढ़ नहीं सकते. आई-फोन और माइक्रोसॉफ्ट से चलने वाले फोन में आप हिन्दी पढ़ सकते हैं और शायद बहुत मेहनत के बाद लिख सकते हैं यानी हिन्दी को अ़ब मोबाइल प्लेटफोर्म में एकसार करने वाली तकनीक की जरूरत हैं.उम्मीद हैं की बाज़ार का जोर भी ये जल्दी ही करा देगा.

शनिवार, 6 जून 2009

हाँ भिया अपन तो इन्दोरी हैं

इंदौर पर ये कविता पूनम जाजू ने भेजी हैं , लिखा किसने हैं मुझे नहीं मालूम पर इंदौर में रहने वाला व्यक्ति ही इससे समझ सकता हैं