बुधवार, 14 सितम्बर 2011

अब ये हिंदी का श्राद्ध पक्ष नहीं , उत्सव हैं


आज श्राद्ध पक्ष का तीसरा दिन हैं और आज हिंदी दिन भी हैं. श्राद्ध पक्ष का जिक्र करने का कारण हिंदी दिवस से जुडी मेरी यादें हैं. करीब १९ साल पहले मैंने मुंबई के नवभारत टाइम्स में काम करना शुरू किया था तोइन १५ दिनों में सरकारी विभागों और सरकारी कंपनियों की विज्ञाप्ति का ढेर लग जाता था. हर विभाग में होड लगी रहती थी कि जैसे तैसे खबर छप जाए कि हिंदी दिवस मन गया. खबर की कतरन शायद किसी फाइल में लग जाती होगी और फिर ये लोग साल भर के लिए हिंदी को भूल जाते थे. हम मजाक में कहते थे कि हिंदी का श्राद्ध हो गया,अब अगले साल याद करेंगे. बाकी दिन यही विभाग हिंदी अखबारों को बड़े दोयम दर्जे का मानते थे और हिंदी प्रदेशों से आने वाले ज्यादातर आईएस भी हिंदी अखबारों के रिपोर्टर से बात तक करने में कतराते थे, खबर देना तो दूर की बात हुई.

मुझे नहीं मालूम कि मुंबई में हिंदी पत्रकारों को क्या अब भी इसी तरह से संघर्ष करना पड़ता हैं, लेकिन पूरे देश की बात करें तो आज हिंदी किसी सरकारी दिन की मोहताज नहीं हैं. दैनिक भास्कर अखबार चलाने वाली कंपनी सरकारी नहीं हैं और आज वो बड़े गर्व से हिंदी दिवस पर ये आयोजन कर रही हैं. हालांकि मुझे लगता हैं कि हिंदी दिवस तो हर रोज हैं. इस देश में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार हिंदी में निकलते हैं. सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खबरों और मनोरंजन के चैनल हिंदी में हैं. और तो और पंडित लोग कितनी भी निंदा करें बोलिवुड के बड़े स्टार भले अपने डायलाग नागरी के बजाय रोमन में पढ़ते हो लेकिन हैं तो वो भी हिंदी हैं जब हर जगह हिंदी छाई हुई हैं तो एक दिन या पखवाड़ा मनाने में कहीं न कहीं हमारी हीन भावना भी झलकती हैं.

हम अपने आपको अंग्रेजी के मुकाबले हीन समझते आये हैं, मैं फिर २० साल पुरानी बात पर लौटुंगा. जब देश में आर्थिक नीतियों में बड़ा बदलाव १९९१ में हुआ तो बहुत डर था कि अंग्रेजी छा जाएगी और हिंदी का कोई भविष्य नहीं होगा. अब २०११ के इंडियन रीडरशिप सर्वे के मुताबिक अगर आप टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, हिंदू और टेलीग्राफ की पाठक संख्या जो ले तो ये अकेले दैनिक भास्कर के एक करोड़ ४० लाख पाठकों के बराबर बैठती हैं. आप कहते हैं कि हिंदी में पाठक तो अंग्रेजी से हमेशा ज्यादा रहेंगे, पर पैसा ज्यादा नहीं हैं. मेरे पास चूंकि सिर्फ लिस्टेड कम्पनियों के आंकड़े मौजूद हैं इसलिए दैनिक भास्कर और जागरण का जिक्र करना चाहूँगा, इन दोनों कंपनियों का सालाना मुनाफा अंग्रेजी अखबार छापने वाली हिंदुस्तान टाइम्स की कंपनी से ज्यादा हैं. भास्कर का मुनाफा २६७ करोड रुपये था, जागरण का २०५ करोड़ रुपये और हिंदुस्तान टाइम्स का १७७ करोड़ रुपये.
तो साहब, पाठक भी हैं, दर्शक भी हैं, और तो और पैसे भी हैं. फिर हम हीन कैसे हुए? मुझे लगता हैं कि हीनता का कारण हैं एलीट क्लास में हमारे प्रभाव की कमी, प्रभाव की कमी को हम उस क्लास का पूर्वाग्रह मानते हैं. ये काफी तक सच हो सकता हैं, लेकिन हमे अपने अंदर की कमी को भी पहचाना होगा वो कमी ज्यादातर विषयों पर हमारे अधिकार की कमी. हम राजनीति पर अधिकार रखने वाले पत्रकार तो पैदा कर पाए हैं ,एक हद तक खेल और सिनेमा पर भी, लेकिन व्यापार, साइंस,हे़ल्थ, टेक्नोलॉजी जैसे अनेक विषय हमारे दायरे से बाहर हैं. हमे लगता हैं कि ये विषय हमारे टाइप के नहीं हैं और हम इन्हें किनारे छोडकर आगे बढ़ जाते हैं. ये टाइप तयकर के हम अपने पाठक और दर्शक की समझ का अपमान करते हैं. सच तो ये हैं कि हम इसे सरल भाषा में समझाने की जेहमत उठाना नहीं चाहते. ये हीन भावना तभी खत्म होगी जब हमारा प्रयास सिर्फ हिंदी मीडिया में सबसे बेहतर होने के बजाय सभी भाषाओं के मीडिया में बेहतर होने का होगा. हिंदी दिवस पर दैनिक भास्कर के आयोजन में मेरे विचार)

रविवार, 26 जून 2011

तब महंगाई पर आंदोलन करने वाली थी सोनिया जी,अब...?



आम आदमी की रोजमर्रा जरूरत की चीजों के दाम आसमान को छु रहे हैं. पेट्रोल, डीजल,रसोई गैस और किरासिन के दाम लगातार बढाये जा रहे हैंआम आदमी की जिदंगी महंगाई और भ्रष्टाचार ने बहुत मुश्किल कर दी हैं.ये बहुत बड़ा चेलेंज हैं. हमें केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन करना पड़ेगा
                                              -कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी

       (  अक्टूबर 2000 को छिंदवाडा के कांग्रेस भवन का उद्घाटन समारोह में भाषण)


सोनिया गांधी का ये बयान आज उनकी यूपीए सरकार पर सटीक बैठता हैं, लेकिन उन्होंने ये बयान ठीक 11 साल पहले  बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के लिए दिया था. 11 साल में कुछ भी नहीं बदला, बदला हैं तो सिर्फ पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और किरासिन का भाव.

फिर 2004 में लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने एक चार्जशीट पेश की थी, उसमें लिखा था –


 “ एनडीए इकोनोमी के बारे में बड़े-बड़े दावे करता हैं,फिर भी देश की बड़ी आबादी रोज भूखी सोती हैं. दाम अभूतपूर्व स्तर को छु रहे हैं. 1994 में एक लीटर डीजल 7 रुपये 80 पैसे में मिलता था और 2004 में 20 रुपये 53 पैसे में ,पेट्रोल 11 रुपये 75 पैसे में एक लीटर मिलता था और 2004 में 33 रुपये 70 पैसे का. 1994 से 2004 तक रसोई गैस के दाम दोगुना हो गए हैं”.


 चार्जशीट में आगे लिखा था कि “इंडिया सिर्फ एनडीए के लिए शाइन कर रहा हैं 21वीं सदी कांग्रेस पार्टी की हैं. देश की जनता ईमानदार और काम करने वाली सरकार चाहती हैं. कांग्रेस देश को ऐसी सरकार देगी”.


तो साहब, देश में सात साल से कांग्रेस की ‘ईमानदार और काम करने वाली सरकार’ हैं. इस सरकार के राज में डीजल 20 रुपये से बढ़कर 41 रुपये कुछ पैसे हो गया हैं और पेट्रोल 33 रुपये से बढ़कर 69 रुपये कुछ पैसे हो गया हैं. ये दिल्ली के रेट हैं, बाकी देश में और महंगा हैं. दाम लगभग दो गुना हो गए हैं. सरकार की दलील हैं कि 2004 में कच्चे तेल का दाम प्रति बैरल 36 डॉलर था, वो अब 110 डॉलर के आसपास हैं यानी लगभग तीन गुना. फिर भी देश में दाम दो गुना ही बढ़े और ये दाम बढाकर भी सरकार घाटे हैं.



सवाल ये हैं कि क्या ये गणित सोनिया गांधी या कांग्रेस पार्टी को चुनाव से पहले नहीं पता था? बिलकुल पता होगा, ना सिर्फ कांग्रेस को बल्कि बीजेपी को भी, पर वोट पाने के लिए महंगाई का रोना रोने में क्या बुराई हैं. बीजेपी भी अब उसी तरह से रो रही हैं जैसे कांग्रेस पार्टी रोया करती थी विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज का बयान वैसा ही हैं जैसे सोनिया गांधी ने ११ साल पहले दिया था. सुषमा स्वराज ने ट्विट्टर पर लिखा हैं – “ पेट्रोलियम पदार्थों के दाम दसवीं बार बढ़ाये गए हैं, कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा देकर ये सरकार बनीं और आम आदमी को क्या मिला.आम आदमी की मुश्किलों के प्रति ये सरकार संवेदनशील नहीं हैं” 


अब कांग्रेस का बयान देख लीजिए, पार्टी महासचिव जनार्दन दिवेदी ने कहा- “ कई बार सरकार को कड़े फैसले लेने पड़ते हैं,डीजल की कीमत बढ़ने से हर किसी को मुश्किल होगी,पर आप सारे तथ्य देखेंगे तो समझ जाएंगे कि दाम बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं था”. ये बयान तब के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के करीब 12 साल पुराने बयान से मिलता जुलता हैं, उन्होंने एनडीए की सरकार 1999 में फिर बनने पर कहा था-“ हमें कड़े कदम उठाने पड़ेंगे. डीजल के बढ़े दाम वापस नहीं हो सकते. इससे आम आदमी पर बोझ पड़ेगा, लेकिन कोई चारा नहीं था”.

कांग्रेस और बीजेपी के पुराने बयान खोजने में काफी मेहनत करना पड़ी, सिर्फ ये साबित करने के लिए की सरकार किसी की भी हो कम से कम पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतें काबू करने का प्लान किसी पार्टी के पास नहीं हैं. फिर भी इस पर पॉलिटिक्स उसी तरह से होती हैं, जैसे पिछली बार हुई थी.  हर पार्टी जब सरकार में होती हैं तब उसे याद रहता हैं कि देश की जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल बाहर से आता हैं और उसकी कीमत सरकार घटा-बढ़ा नहीं सकती. जब दुनिया के बाजार में दाम बढ़ेंगे तब देश में भी बढ़ेंगे. सरकार से हटते ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों ये बात भूल जाते हैं. 



शनिवार, 21 अगस्त 2010

करोड़पति बहुमत में हैं!

सांसदों की सेलरी को लेकर हर किसी की राय हैं, मुझे भी लगा कि इस तर्क में काफी दम हैं कि सांसदों की सेलरी सरकारी बाबू से एक रुपया ज्यादा यानी ८०,००१ रुपये होना चाहिए. आखिर ज्यादातर सांसद बड़ी मुश्किल से अपना खर्चा निकाल पाते होंगे. लेकिन कौन अमीर और कौन गरीब का हिसाब खोजा तो ये आंकड़ा सामने आया.

१५वीं लोकसभा में ३१४ करोड़पति सांसद हैं

११६ सांसदों की संपति १० से ५०लाख के बीच हैं

सिर्फ १५ सांसदों की संपति १० लाख से कम हैं

नेशनल इलेक्शन वाच का ये आंकड़ा साबित करता हैं कि करोड़पति सांसद लोकसभा में बहुमत में हैं. बहुमत के लिए २७२ सांसदों की जरूरत होती हैं, इस लोकसभा में तो ३१४ करोड़पति हैं. इन सांसदों का बहुमत कहिए या कुछ और, नतीजा ये रहा कि सांसद को अब तक हर महीने ६० हजार रुपये मिलते थे , आगे से एक लाख 30 हजार रुपये मिलेंगे.अब जरा ये देख ले कि जिन लोगों ने इन सांसदों को चुनकर भेजा हैं उनका क्या हाल हैं?

२००९-१० में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आमदनी ३३ हजार ५८८ रुपये होने का अनुमान हैं

देश अब प्रति सांसद हर साल २१ लाख( द टेलीग्राफ) से ३७ लाख( टाइम्स ऑफ इंडिया) रुपये खर्च करेगा

यानी सांसद की आमदनी आम आदमी की आमदनी के कम से कम ६२ गुना ज्यादा हैं.

अगर आप भूले ना हो तो लोकसभा में महंगाई पर बहस हुई तो सरकार ने कहा कि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने पड़े. विपक्ष ने कहा कि टैक्स यानी सरकारी आमदनी को कम कर दिया जाये. पेट्रोल डीजल बनाने का जितना खर्च आता हैं सरकार उतना ही टैक्स लगा देती हैं. सरकार ने टैक्स कम नहीं किया क्योंकि घाटा बढ़ रहा हैं.पर घाटे में चल रही सरकार सांसदों पर मेहरबान हो गयी अब हर साल उन पर १७२ करोड रुपये खर्च होगा. तो क्या ये कहा जाए कि बूंद-बूंद ही सही थोड़ा सा पेट्रोल डीजल माननीय पी गए?


शनिवार, 7 अगस्त 2010

हाजी मस्तान ने कहा था-' मैंने कभी तस्करी नहीं की'

'Once Upon a time Mumbaai' पिछले हफ्ते देखी तो हाजी मस्तान से मुलाकात याद ताजा हो गया. हाजी मस्तान से मैं ठीक १९ साल पहले मुंबई में मिला था, तब दिल्ली से पढ़ाई खत्म करके मुंबई पहुंचे मुश्किल से दो महीने हुए थे. मस्तान तब अंडरवर्ल्ड से ' रिटायर' हो चुका था. ये इंटरव्यू इंदौर से निकलने वाले साप्ताहिक ' प्रभात किरण' में जुलाई १९९१ में छपा था. इंटरव्यू के अंश-
हाजी मस्तान मिर्ज़ा, अध्यक्ष,ऑल इंडिया दलित मुस्लिम अल्पसंख्यक महासंघ, ४१०, आर्केडिया बिल्डिंग, सर जे जे रोड, जे जे अस्पताल के सामने, बम्बई- ४००००८. हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में छपा हाजी मस्तान का विजिटिंग कार्ड उनका कुल यही परिचय देता हैं. वार्डेन रोड पर सोफिया कॉलेज लेन में उनकी दुमंजिला कोठी हैं ' वर्ते-उल-सुरूर' यानी शांति निवास. पिछले शुक्रवार की शाम साढ़े पांच बजे का वक़्त दिया गया था, पहुंचने पर पता चला कि ' बाबा साहेब' (उन्हें इसी नाम से जाना जाता हैं) दोपहर को जुम्मे की नमाज के बाद सोकर नहीं उठे हैं. स्वागत कक्ष में मस्तान की तीन अलग -अलग तस्वीरें लगी थी. पहली तस्वीर जवानी की थी, कोट- टाई पहने. दूसरी तस्वीर में अधेड मस्तान का पोट्रेट था और तीसरी में दुनिया देख चुके ' बाबा साहेब' का.
करीब साढ़े छह बजे बुलावा आया. हाजी मस्तान पहली मंजिल पर अपने छोटे से कमरे में हल्के आसमानी रंग का सफारी सूट पहनकर बैठा था. सामने टेलिविजन पर ' सनम बेवफा' फिल्म चल रही थी. बताया गया कि केबल टीवी हैं. खैर बाबा साहेब ने रिमोट कंट्रोल से टीवी कि आवाज बंद कर दी और इधर बातचीत शुरू हो गई

आपने दलित मुसिलम अल्पसंख्यक सुरक्षा महासंघ क्यों बनाया?

मुसलमान और दलितों को एकजुट करने के लिए, देश में इनकी आबादी करीब चालीस फीसदी हैं, मगर ये बहुत पिछड़े हैं. पढ़ाई- लिखाई नहीं हुई, सरकारी नौकरी नहीं मिली. पुलिस और फिरकापरस्त इन पर अलग जुल्म करते हैं. एक होकर ही ये लोग हक पा सकेंगे. मौलाना आजाद और किदवई साहब के बाद कोई नेता नहीं हुआ. डा. आम्बेडकर के बाद दलितों के लिए किसी ने नहीं सोचा.

वी पी सिंह और कांशीराम भी तो आपकी पार्टी जैसा काम कर रहे हैं?
दोनों जनता को बेवकूफ बना रहे हैं. इनका मकसद वोट बैंक हैं, दलित और मुसलमानों की भलाई नहीं. आपको याद दिला दूं मैंने १९८५ में महासंघ बनाया था. बाद में इन दोनों ने सोचा

मगर १९८८ के इलाहाबाद उप चुनाव में तो आपने वी पी सिंह के लिए काम किया था?
मुझे उम्मीद थी कि यह आदमी अच्छा काम करेगा,पर इसने किसी की उम्मीद नहीं पूरी की.

आपने १९८४ में दक्षिण बम्बई से लोकसभा के लिए पर्चा दाखिल किया था, फिर वापस क्यों ले लिया?
मुझे लगा कि मैं चुनाव जीत नहीं सकूंगा, बल्कि मेरी उम्मीदवारी से फिरकापरस्तों की जीत होगी. इसी वजह से मेरी पार्टी चुनाव नहीं लड़ रही हैं. पहले हम जमीन पुख्ता कर रहे हैं

तो क्या आप भविष्य में चुनाव लड़ेंगे?
सोचेंगे ( सिगरेट जलाते हुए उन्होंने रुककर जवाब दिया)

आप पर तस्करी करने के आरोप लगे हैं?
मैंने कभी तस्करी नहीं की. मुझे झूठे मामलों में फंसाया गया.आपतकाल में पकड़कर घर की तलाशी ली गई मगर कुछ हाथ नहीं लगा. अदालत ने मुझे हर इल्जाम सेबाइज्जत बरी कर दिया हैं

पर जय प्रकाश नारायण के सामने तो आपने आइन्दा तस्करी तस्करी नहीं करने की कसम खायी थी. यह वादा भी किया था कि तस्करी करने वालों को रोकेंगे.
जय प्रकाशजी के सामने मैंने मुल्क के खिलाफ कोई काम नहीं करने की कसम खायी थी.रही बात तस्करों को रोकने की तो मुझे नहीं मालूम कि तस्कर कौन हैं?

फिर आपका पेशा क्या हैं?
शुरू से बिजनेस करता हूं, कपड़े की दुकानें हैं

पेशे के लिए वक्त निकाल लेते हैं?
अब नहीं, मैं समाज सेवा को ज्यादा वक्त देता हूं.दुकानें मेरे आदमी देखते हैं

इंटरव्यू में आगे हाजी ने दो बातें और कही थी. अयोध्या में मंदिर- मस्जिद दोनों बने. दोनों पक्ष न माने तो अदालत का फैसला माने. दूसरी बात ये कि भारत -पाकिस्तान को एक हो जाना चाहिए. याद रहे ये इंटरव्यू अयोध्या में विवादस्पद ढांचा गिराने से करीब डेढ़ साल पहले हुआ था. इंदौर के बारे में कुछ बातें कही थी जो शायद आज प्रासंगिक नहीं रही.
फिल्म देखने के बाद ये इंटरव्यू आज दोबारा पढ़ा तो लगा कि हाजी मस्तान इज्जत पाने की राह पर काफी आगे बढ़ चुका था. फिल्म में उसकी मौत तभी हो गई जब वो नेता बनने के लिए पहली बार मंच पर आता हैं, लेकिन असल जिंदगी में वो जेपी के सामने कसम खा चुका था, वीपी सिंह का चुनाव प्रचार कर चुका था, खुद चुनाव का पर्चा भरकर वापस ले चुका था और सबसे बड़ी बात की किसी अदालत में उस पर कोई गुनाह साबित नहीं हो पाया.


रविवार, 18 जुलाई 2010

लादेन जिन्दा होगा तो वो भी हंसेगा

पिछले करीब नौ साल से पूरी दुनिया ओसामा बिन लादेन के टेप देखते सुनते आयी हैं, हर बार ये टेप बाहर आने पर हम सब के मन में सवाल आता हैं कि ये कैसे और कब शूट होता होगा?क्या लादेन जिन्दा हैं? या फिर कहीं अमेरिका ही तो ये टेप बनाकर जारी नहीं करता? अभिषेक शर्मा ने इन्ही सवालों के इर्दगिर्द ' तेरे बिन लादेन' बना डाली जो अमेरिका,पाकिस्तान और न्यूज़ चैनल पर हंसती हैं. लादेन जिन्दा होगा तो वो भी फिल्म देखकर खूब हंसेगा
फिल्म कराची में रची-बसी हैं. हीरो अली हसन ९/११ के तीन दिन बाद अमेरिका में नौकरी करने निकलता हैं पर हमले से डरे अमेरिका में आतंकवादी समझकर वापस भेज दिया जाता हैं. कहां तो वो अमेरिका के न्यूज़ चैनल में काम करने चला था,पर कराची के डंका टीवी का रिपोर्टर बनकर रह जाता हैं. डंका टीवी के एडीटर -कम - मालिक उसे किसी लायक नहीं मानते.रह रहकर अमेरिका जाने का उसका सपना जाग जाता हैं.एजेंट उसे अमेरिका भेजने के बदले १० लाख रुपये मांगता हैं.इस बीच, डंका टीवी में भी उसकी नौकरी पर बन आती हैं. उसे मुर्गो की बांग के नेशनल कॉम्पिटिशन कवर करने एडीटर ये कहकर भेजता हैं कि अबकी बार स्टोरी ठीक से नहीं की तो नौकरी गई समझो. स्टोरी जिस तरह शूट होती हैं उसमे उसकी नौकरी जाना तय लगता हैं. तभी एडिट टेबल पर उसकी नज़र विजेता मुर्गे के मालिक नूर पाशा पर पड़ती हैं. हजार मुर्गियों का मालिक ओसामा का हमशक्ल हैं. अली नूर को फंसाकर उसका टेप बनाता हैं और ओसामा की अमेरिका को चेतावनी का टेप अपने ही चैनल के मालिक को १० लाख में बेच देता हैं. टेप भारत के चैनल से होते अमेरिका पहुंचता हैं. नकली टेप ऐसी आग लगाता हैं कि अमेरिका बिना सोचे समझे अफगानिस्तान पर हमला बोल देता हैं.
हीरो के पास अमेरिका जाने के लिए १० लाख तो हैं पर जंग के हालात में एजेंट अपना कारोबार समेट लेता हैं. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंट पाकिस्तान पहुंच कर अपनी मुहिम शुरू करते हैं. अमेरिका किस तरह अंधेरे में तीर चलता हैं उसकी खूब चुटकी ली गई हैं. अमेरिकी अधिकारी पाकिस्तानी अधिकारी से कहता हैं कि टेप में ओसामा के पीछे जो नक्शा हैं वो उर्दू में हैं यानी ओसामा पाकिस्तान में ही हैं. पाकिस्तानी अधिकारी पूछता हैं कि फिर आप अफगानिस्तान में मिसाइल क्यों दाग रहे हैं तो अमरीकी अधिकारी कहता हैं कि एक बिलियन डॉलर के बजट उसे पाकिस्तान में बैठकर कॉफ़ी पीने के लिए नहीं दिया गया हैं.
खैर, इस भागमभाग में अमेरिकी और पाक एजेंट अली हसन और नकली ओसामा तक पहुंच जाते हैं और असलियत का पता चलने पर सिर पकड़ लेते हैं कि कैसे एक रिपोर्टर ने पूरी दुनिया और खासकर अमेरिका को बेवकूफ बना दिया. इस झूठ पर पर्दा डालने के लिए एक और झूठ बोला जाता हैं. अली नकली ओसामा का इंटरव्यू करता हैं, जिसे अमेरिका असली बनाकर पेश करता हैं. इस इंटरव्यू में ओसामा सीज फायर का ऑफर देता हैं. व्हाइट हाउस इसे ताबड़तोड़ मान लेता हैं और दुनिया में अमन कायम हो जाता हैं.माफ़ कीजिएगा पर फिल्म पर लिखते लिखते में कहानी बताने को मोह टाल नहीं पाया. फिल्म का मजा कहानी से ज्यादा उन सिचुएशन में हैं जो हर मोड पर आपको हंसाती हैं.
चलते चलते ये बात कि हम न्यूज़ चैनल इस सीजन के फ्लेवर मालूम पड़ते हैं क्योंकि अगले ही महीने पिपली लाइव आ रही हैं. रण आ कर पीट चुकी हैं.लव, सेक्स और धोखा चल चुकी हैं. तेरे बिन लादेन चल पड़ी हैं और पिपली लाइव भी शायद चल ही जायेगी. चलने वाली फिल्म में एक ही बात समान हैं,नए एक्टर, छोटा बजट और अच्छी कहानी को कहने का नया तरीका. बोलिवुड के बड़े स्टार्स के लिए जो सबक हैं वहीं न्यूज़ चैनल के लिए भी सबक हैं.

सोमवार, 8 फरवरी 2010

शालिनीताई का स्कूल

इन्दौर के बाल निकेतन संघ की कर्ताधर्ता शालिनीताई मोघे का कल यानी ३० जून को निधन हो गया. मैंने पिछले साल स्कूल के छात्र सम्मलेन के मौके पर ये ब्लॉग लिखा था. थोड़ा ठीकठाक करके फिर प्रकाशित किया हैं                                                        बाल निकेतन संघ में नौवी से ग्यारहवीं कक्षा तक मैंने पढाई की थी.पिछले साल हमारे स्कूल के पुराने छात्रों का सम्मेलन था, तब वहाँ जाना हुआ. बड़ी अच्छी-अच्छी बाते हुई, इस स्कूल ने हम सबको बहुत कुछ सिखाया. सीखने से मेरा मतलब फिजिक्स, केमिस्ट्री या गणित नहीं हैं. ये शायद उस ज़माने में इंदौर का अकेला स्कूल था जो बाबा आम्टे, यदुनाथ थत्ते जैसे बड़े लोगो को लेक्चर देने बुलाता था. इन लोगों से जो सुनने मिला वो मन पर संस्कार छोड़ गया. सादा जीवन जीना चाहिए, पर्यावरण की रक्षा करना चाहिए. इसमें से ग्लोबल वार्मिंग तो अब फैशन में भी हैं, बहुत सारे दोस्त मुझ से नाराज होंगे पर सच तो ये हैं कि बाल निकेतन संघ अब फैशनेबल नहीं रहा.फैशनेबल से मेरा आशय हैं कि जहां आज की पीढ़ी पढ़ना चाहती हैं.
२४ साल यानी मेरी स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद इंदौर काफी बदल गया हैं. बाल विनय मंदिर सरकारी स्कूल था पर एडमिशन मुश्किल से मिलता था. बाल निकेतन प्रायवेट स्कूल था, एडमिशन के लिए अच्छे नंबर के अलावा टेस्ट देना पड़ता था. इसके अलावा दयानंद और वैष्णव जैसे स्कूल थे जहाँ इन्दौर के मिडल या लोअर मिडिल क्लास परिवारों के बच्चे पढते थे. इन स्कूलों में पढाई हिन्दी और इंग्लिश दोनों मीडियम में होते थी. बड़े परिवारों के बच्चों का स्कूल था सेंट पॉल.डेली कॉलेज तो खैर बड़े-बड़े लोगो की पहुंच से बाहर था. इंदौर बदलने का संकेत इस बात से मिलना हैं कि मेरे जानने वालों में से अब कोई बच्चा बाल विनय, बाल निकेतन, दयानंद या वैष्णव में नहीं पढता हैं. ज्यादातर बच्चे अब उन स्कूलों में पढते हैं जिनका नाम २५ साल पहले किसी ने नहीं सुना था. बाल निकेतन की तरह ये नए स्कूल इंदौर की नयी पीढ़ी बनाने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ धंधा करने के लिए खुले हैं. ये स्कूल धंधा भी कर रहे हीं और आज के ज़माने की जरूरत के हिसाब से डॉक्टर, इंजिनियर पैदा करने का काम बहुत अच्छे से कर रहे हैं.
 शालिनीताई ताई मोघे ९८ साल की उम्र तक स्कूल चलती रही है, इंदौर को उनकी याद पिछले साल जाकर आई तो नागरिक अभिनंदन हुआ. शालिनीताई गाँधीवादी विचारधारा को मानने वाली महिला हैं. उन्होंने इस स्कूल को को बड़ा किया. शिक्षा के क्षेत्र में काम के लिए उन्हें १९६८ मैंने यानी मेरे पैदा होने से पहले पदमश्री मिला था. पद्म पुरस्कार के बारे में कम से कम तब कोई रेकेटबाजी का आरोप नहीं लगाता था. शालिनीताई के पिता तात्या साहेब सरवटे ने बाल निकेतन की स्थापना की थी.शालिनीताई और उनके पति दादासाहेब ने उसे बहुत आगे बढ़ाया. दादासाहेब तो हमे भी अंगरेजी पढाया करते थे. शालिनीताई से उस दिन भीड़भाड़ में लंबी बात नहीं हो पायी, पर अखबार में उनका इंटरव्यू पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा कि वो पब्लिक स्कूलों के कल्चर में बाल निकेतन को नहीं ढालना चाहतीं हैं. ये बहुत अच्छा ख्याल हैं, लेकिन मुझे दुख इस बात का हैं कि बाल निकेतन के मैदान छोड़ने या फैशनेबल ना होने का फायदा सिर्फ और सिर्फ धंधेबाज स्कूलों का हुआ हैं, नुकसान बाल निकेतन का भी नहीं हुआ हैं. इंदौर शहर जरूर घाटे में रहेगा. ये घाटा भी उनको समझ में आएगा जिन्होंने शहर को बदलते हुए देखा हैं.
शालिनी ताई को मेरी श्रद्धांजलि.

सोमवार, 1 फरवरी 2010

गूगल की जय हो !

प्रमोद महाजन जब आईटी मंत्री बने थे तो उन्होंने मुम्बई में प्रेस कांफ्रेंस के बाद पूछा था कि सरकार आप लोगों के लिए क्या कर सकते हैं? ये वैसा ही सवाल था जैसा हर नेता हरेक आदमी से पूछता हैं और आदमी चौड़ा हो जाता हैं कि मुझे पूछा तो सही. मैंने महाजन के सवाल के जवाब में कहा था कि हिंदी का फॉण्ट और टाइपिंग का यूनीफोर्म सॉफ्टवेयर डेवेलप करा दीजिए. ये कोई १० साल पहले की बात होगी. उन दिनों में सी-डेक इस दिशा में काम कर रहा था, फिर भी जितने फॉण्ट होते थे उतने की-बोर्ड.हमारे इंदौर के वेबदुनिया वालों ने भी फोनेटिक की-बोर्ड बनाया था.ये सब प्रयोग होते-होते हिंदी का एक की-बोर्ड डेवलप हो गया जो अलग-अलग फॉण्ट पर भी चलने लगा.मैं तमाम कोशिश के बाद भी इस की-बोर्ड से हिंदी टायपिंग नहीं कर पाया.हिन्दी और अंगरेजी के अलग-अलग की-बोर्ड याद करना मुश्किल हैं.

खैर, गूगल ने करीब दो-ढाई साल पहले वो सॉफ्टवेयर ला दिया जिसके जरिये आप रोमन की-बोर्ड में टाइप करें और नागरी के शब्द लिखे. ये सॉफ्टवेर भी थोडा जटिल था, लिखा हुआ सेव करने में दिक्कत होती थी और उससे भी बड़ी परेशानी ये थी कि ये सॉफ्टवेयर बिना इंटरनेट के नहीं चलता था, पर गूगल ने इस साल की शुरुआत में कमाल कर दिया. ये सॉफ्टवेर आप अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड कर सकते हैं और मजे से टाइप कर सकते हैं.ये ब्लॉग मैंने आज ऑफ़लाइन लिखा हैं.गूगल ने वो कर दिया जो भारत सरकर हिंदी के लिए नहीं कर पायी. न प्रमोद महाजन न ही उनके बाद आने वाले आईटी मंत्री.

हालाँकि स्मार्टफोन के ज़माने में ये तकनीक अभी भी पीछे हैं,ब्लैकबेरी पर आप हिंदी में मेल क्या कुछ भी लिख पढ़ नहीं सकते. आई-फोन और माइक्रोसॉफ्ट से चलने वाले फोन में आप हिन्दी पढ़ सकते हैं और शायद बहुत मेहनत के बाद लिख सकते हैं यानी हिन्दी को अ़ब मोबाइल प्लेटफोर्म में एकसार करने वाली तकनीक की जरूरत हैं.उम्मीद हैं की बाज़ार का जोर भी ये जल्दी ही करा देगा.